दीपावली के उपलक्ष में आज गोविंद नगर में महापौर प्रमिला पांडे व वरिष्ठ पार्षद नवीन पंडित जी के द्वारा गोविंद नगर में दिया बाटा गया
आज महापौर प्रमिला पांडे व वरिष्ठ पार्षद नवीन पंडित जी के द्वारा गोविंद नगर में दीपावली के महत्व पर हर दुकानों में गलियों में और सरस्वती शिशु मंदिर में दीया बाट कर सबको स्वच्छता की ओर इस अवसर पर जसपाल भगत प्रकाश वीर आर्या अवध बिहारी अवस्थी शम्मी बल्ला दिवाकर मिश्रा अनीता दीक्षित रश्मि सिंह मोहनी निषाद लक्ष्मण सिंह नीरज त्रिपाठी राजीव अवस्थी सचिन शर्मा टोनी ग्रोवर धर्मेंद्र अरविंद यादव जिला स्वास्थ्य अधिकारी दयानंद मुरझानी व सभी सफाई नायक सभी भाजपा कार्यकर्ता मौजूद रहे दीपावली और देवी दरिद्रा....।
आज से दो दिनों बाद दिवाली है।उस दिन महालक्ष्मी की पूजा -अर्चना होती है।ऐसी मान्यता है कि दीपावली के दिन देवी महालक्ष्मी के साथ देवी दरिद्रा भी घर में प्रवेश करतीं हैं। गांव -देहातों में दिवाली की प्रातः घर की औरतें सूप को कंडे से पीटते हुए दरिद्रा को घर से भगाती है।
आखिर यह दरिद्रा है कौन?
हमारे शास्त्रों में दरिद्रा को देवी कहा गया है। समुद्र मंथन के समय हलाहल निकलने के बाद दरिद्रा उत्पन्न हुई, तत्पश्चात महालक्ष्मी निकलीं। इसलिए दरिद्रा को लक्ष्मी की बड़ी बहन या ज्येष्ठा भी कहा गया है। ज्येष्ठा से कोई देवता शादी को तैयार नहीं हुए तो दु:सह नामक ब्राह्मण के साथ उनका विवाह हुआ। विवाह के उपरांत दु:सह मुनि अपनी पत्नी के साथ विचरण करने लगे।जिस स्थान पर भगवान का उद्घघोष होता,होम होता,वेदपाठ होता,पूजा -पाठ होता, भस्म लगाए लोग होते,ज्येष्ठा वहां से अपनी दोनों कान बन्द कर भाग जाती।यह देख दु:सह मुनि उदिग्न हो गये।उन दिनों सब जगह धर्म -कर्म की चर्चा और पुण्य कृत्य हुआ ही करते थे।अंत: दरिद्रा भागते भागते थक गई।
तब उसे लेकर दु:सह मुनि निर्जन वन की ओर गये। कुछ दूर आगे जाने पर महर्षि मार्कण्डेय को आते हुए देखा। दोनों ने महर्षि को साष्टांग प्रणाम किया और कहा," हे महर्षि, मैं अपनी इस भार्या दरिद्रा के साथ कहां रहूं और कहां न रहूं।"मार्कण्डेय ऋषि ने पहले उन स्थानों को बताया जहां दरिद्रा को प्रवेश नहीं करना चाहिएं अर्थात् वहां दरिद्रा का वास वर्जित है........
जहां भगवान शिव और माता पार्वती के भक्त हों,भस्म लगाए लोग हों, जहां लक्ष्मीनारायण, गोविन्द, महादेव आदि भगवान के नाम का कीर्तन होता हो वहां तुम दोनों नहीं जाना क्योंकि आग उगलता विष्णु -चक्र वहां पहरा देता है।जिस घर में स्वाहा,वष्टकार,वेद का घोष होता हो, जहां लोग नित्यकर्म में संलग्न हो,, भगवान के पूजा-अर्चना में लगे हों, तो हे दरिद्रा,उस घर को तुम दूर से ही त्याग देना। जिस घर में भगवान की मूर्ति हो,गायें हों, भक्त हों,साधु -संतो की सेवा होती हो, वहां तुमलोग भूल कर भी मत जाना।
तब दु:सह मुनि ने पूछा-महर्षि,अब आप हमें यह बतायें कि दरिद्रा के रहने का स्थान कौन सा है? महर्षि मार्कण्डेय ने दरिद्रा के वास करने का स्थान बताया --
जिस घर में कलह हो, पिता -पुत्र,भाई -भाई,पति -पत्नी परस्पर झगड़ा करते हों उस घर में हे दरिद्रा,तुम निर्भय प्रवेश कर जाना।जहां भगवान की निंदा होती हों,जप,तप,होम, वेदपाठ आदि न होता हो वहां तुम निवास करना।जो लोग बच्चों, अतिथियों,साधु -संतों को न खिलाकर स्वयं अपने खा लेते हों उस घर में दरिद्रा निवास करे।जिस घर के लोग आलसी हों, परिश्रमी न हों,दूसरों से जलन रखते हों वहां तुम घुस जाया करो।जिस घर लोग स्नानादि मंगल कृत्य न करते हों,दांत -मुंह साफ न करते हों,गंदे कपड़े पहनते हों,संध्या काल में सोते हों या खाते हों,जुआ खेलते हों, ब्राह्मण का धन हरण करते हों,पर स्त्री से संबंध रखते हों या वेश्यागामी हों वह घर तुम्हारे लिए सुरक्षित निवास है। जिस घर के परिसर में कांटेदार, दूधवाला वृक्ष,पलास, ताड़,भिलोर,तमाल,इमली कदंब,खैरा आदि के पेड़ हों वहां तुम हे दरिद्रा,निवास करना। महर्षि मार्कण्डेय के बताकर चले जाने के बाद दु:सह मुनि ने अपनी पत्नी दरिद्रा से कहा कि मैं भी तपस्यारत होना चाहता हूं सो हे प्रिया,तुम महर्षि के बताए स्थानों पर जाकर निवास करो।
तब से देवी दरिद्रा विचरण करती रहती है। जहां कहीं भी उपरोक्त स्थान मिल जाता है, प्रवेश कर जाती हैं। दरिद्रा के आते ही वह घर बर्बाद होने लगता है।
सो हे मेरे आत्मीय, सावधान रहें। आपके घर में दरिद्रा निवास नहीं करें इसके लिए अपनी कमजोरियां दूर करें।घर में आपसी प्रेम, सद्भाव बनाए रखें।

